भीमताल : डॉ. आरएस टोलिया प्रशासन अकादमी, नैनीताल में हिमालयी आपदाओं और उनके दीर्घकालिक समाधान को लेकर दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। महानिदेशक बीपी पांडे की अध्यक्षता में आयोजित कार्यशाला में विशेषज्ञों ने जलवायु परिवर्तन, बढ़ती आपदाओं और उनके प्रभावी समाधान पर गंभीर चर्चा की।
कार्यशाला के प्रथम दिवस महानिदेशक आपदा प्रबंधन प्रकोष्ठ बीपी पांडे ने उत्तराखंड में पूर्व में घटित आपदाओं का उल्लेख करते हुए बताया कि वर्ष 2016 में आपदाओं के कारण 100 लोगों की मृत्यु हुई थी। इसी प्रकार वर्ष 2017 में 150, वर्ष 2020 में 130 और वर्ष 2021 में 204 लोगों की जान गई। उन्होंने कहा कि आपदाओं के कारण जानमाल के नुकसान के साथ-साथ संपत्ति और आधारभूत संरचनाओं को भी भारी क्षति पहुंची है।
उन्होंने कहा कि जलवायु और मौसम परिवर्तन के चलते राज्य में वनाग्नि की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, वहीं शहरी क्षेत्रों में भी नए खतरे सामने आ रहे हैं। पर्यटन गतिविधियों में वृद्धि के कारण प्रतिवर्ष हजारों वाहनों और पर्यटकों की आवाजाही से जल संकट और पर्यावरणीय दबाव बढ़ रहा है।
बीपी पांडे ने बताया कि आपदा प्रबंधन प्रकोष्ठ द्वारा निरंतर क्षमता विकास कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। नवाचार के तहत आउटरीच प्रशिक्षण कार्यक्रमों में आपदा मित्र, आपदा सखी, पीआरडी, होमगार्ड, आशा कार्यकर्ता, स्वयंसेवी संस्थाओं, एनसीसी, एनएसएस और स्थानीय समुदाय को प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
कार्यशाला में पद्मश्री सम्मानित अनूप साह ने हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती आपदाओं को गंभीर चिंता का विषय बताते हुए जलवायु और मौसम परिवर्तन के प्रभावों के न्यूनीकरण पर ठोस प्रयासों की आवश्यकता बताई।
अपर सचिव प्रकाश चंद्रा ने कहा कि मानसून से पूर्व राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के तहत सभी विभागों के बीच समन्वय और सहयोग जरूरी है। उन्होंने जमीनी स्तर पर कार्यरत कार्मिकों और आमजन को आपदा के प्रति जागरूक करने पर जोर दिया।
संयुक्त निदेशक डॉ. महेश कुमार ने तकनीकी सत्र में जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियर पिघलने, पर्वतीय खतरों, भूस्खलन, त्वरित बाढ़ और भूकंप जैसी आपदाओं पर विस्तार से जानकारी देते हुए समाधान पर चर्चा की।
कार्यशाला में आईआईटी रुड़की के डॉ. अनिल कुमार गुप्ता, वैज्ञानिक डॉ. अर्चना सरकार, बीपी पाटनी, डॉ. पवन कुमार, प्रो. सूर्य कुमार, डॉ. बीपी पंत, डॉ. भावेश पांडे समेत विभिन्न विभागों के अधिकारी, वैज्ञानिक, शोधकर्ता और स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधियों सहित करीब 120 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।