भीमताल : राज्य सरकार द्वारा परिषदीय विद्यालयों को मर्ज करने की नीति पर उत्तराखंड राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ ने गहरी आपत्ति जताई है। संघ के जिला महामंत्री बंशीधर कांडपाल ने इसे केवल प्रशासनिक आंकड़ों को समेटने की कवायद नहीं, बल्कि ग्रामीण शिक्षा की आत्मा पर सीधा प्रहार बताया है। उन्होंने कहा कि पांच या उससे कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों को ‘नजदीकी स्कूलों’ में मर्ज करने का निर्णय गांवों की संस्कृति, स्थानीय भाषा और सामुदायिक जुड़ाव को नष्ट करने की धीमी परंतु सुनिश्चित प्रक्रिया है। यह मर्जर व्यवस्था बच्चों को 4 से 5 किलोमीटर दूर स्कूल जाने को विवश करेगी, जिससे न केवल पढ़ाई प्रभावित होगी बल्कि छात्र संख्या में गिरावट, बाल श्रम और बाल विवाह जैसी सामाजिक समस्याएं फिर से सिर उठा सकती हैं।कांडपाल ने कहा कि प्राथमिक विद्यालय किसी भवन या संख्या का नाम नहीं होता, वह गांव के बच्चों के आत्मविश्वास और जीवन की बुनियाद होता है। स्कूलों का यह विलय बच्चों की ऊर्जा, समय और रुचि की बलि देने जैसा है। उन्होंने आगे कहा कि इस निर्णय से शिक्षकों को भी मनोवैज्ञानिक और व्यावसायिक रूप से नुकसान उठाना पड़ेगा। स्थायित्व और आत्मीयता से जुड़े शिक्षकों को नए परिवेश में भेजना, एक प्रकार का अघोषित विस्थापन है, जो उनकी कार्यक्षमता और बच्चों के साथ उनके संबंधों को प्रभावित करेगा। जिला महामंत्री ने चिंता जताते हुए कहा कि इस नीति को लागू करने से पहले न तो शिक्षकों, न अभिभावकों और न ही ग्रामसभाओं से कोई संवाद किया गया। यह ऊपर से थोपी गई प्रशासनिक व्यवस्था, लोकतांत्रिक संवाद की भावना के विपरीत है। कहीं यह नीति गाँवों को कमजोर कर शहरी केंद्रीकरण और शिक्षा के निजीकरण की ओर तो इशारा नहीं कर रही?
उन्होंने कहा कि शिक्षा को सशक्त, सुलभ और आत्मीय बनाने के बजाय, यह नीति उसे संख्या आधारित निष्प्राण तंत्र में बदल रही है। ऐसे में जरूरी है कि समाज, शिक्षक और अभिभावक मिलकर इस मुद्दे पर प्रशासन से संवाद करें। शिक्षा कोई स्प्रेडशीट नहीं, यह जीवन का पहला संवाद है—जिसे मर्ज नहीं किया जा सकता।